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#कबीर"और पगड़ी का मोल

#कबीर"और पगड़ी का मोल       # कबीर"और पगड़ी का मोल Meraj Uddin SiddiquI Merajjourno@gmail.com एक बार कबीर जी ने बड़ी कुशलता से पगड़ी बनाई।  झीना- झीना कपडा बुना और उसे गोलाई में लपेट कर पगड़ी बनाई। पगड़ी को हर कोई बड़ी शान से अपने सिर सजाता हैं।  यह नई नवेली पगड़ी लेकर  कबीर जी दुनिया की हाट में जा बैठे।  ऊँची- ऊँची पुकार उठाई- 'शानदार पगड़ी! जानदार पगड़ी! दो टके की भाई! दो टके की भाई!' एक खरीददार निकट आया। उसने घुमा- घुमाकर पगड़ी का निरीक्षण किया।  फिर कबीर जी से प्रश्न किया- 'क्यों महाशय एक टके में दोगे क्या?'  कबीर जी ने अस्वीकार कर दिया- 'न भाई! दो टके की है। दो टके में ही सौदा होना चाहिए।'  खरीददार भी नट गया।  पगड़ी छोड़कर आगे बढ़ गया। यही प्रतिक्रिया हर खरीददार की रही। सुबह से शाम हो गई।  कबीर जी अपनी पगड़ी बगल में दबाकर खाली जेब वापिस लौट आए।  थके- माँदे कदमों से घर में प्रवेश करने ही वाले थे कि तभी एक पड़ोसी से भेंट हो गई।  उसकी दृष्टि पगड़ी पर पड गई। 'क्या हुआ संत जी, इसकी बिक्री नहीं हुई ?   प...