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मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*

 *मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं* एक गुमनाम शायर की कविता। बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती  ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता  ना ही खाने की नई नई फ़रमायशें हैं *मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं* सुबह जल्दी उठने के लिए भी नहीं होती मारा मारी घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है  पर हर कमरा बेजान सा लगता है  अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता  बचपन की यादें कुछ दिवार पर फ़ोटो में सिमट गयी हैं  *मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं* अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता  ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती  खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी अब नहीं मिलती  ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है  ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है  बजट की खींच तान भी अब नहीं है *मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं* पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया  पता ही नहीं चला  इतना ख़ूबस...