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मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*

 *मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*

एक गुमनाम शायर की कविता।


बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती 

ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं

रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता 

ना ही खाने की नई नई फ़रमायशें हैं


*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*


सुबह जल्दी उठने के लिए भी नहीं होती मारा मारी

घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है 

पर हर कमरा बेजान सा लगता है 

अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता 

बचपन की यादें कुछ दिवार पर फ़ोटो में सिमट गयी हैं 

*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*


अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता 

ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है

खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती 

खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी अब नहीं मिलती 

ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है

ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है 

ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है 

बजट की खींच तान भी अब नहीं है


*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*


पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया 

पता ही नहीं चला 

इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया 

तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था 

पल में हँसना पल में रो देना 

बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था 

कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना 

सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना 

बार बार उठ कर रज़ाई को उड़ाना 

अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है 

*मेरे बच्चों का प्यारा बचपन कहीं खो गया है*


अब कोई जुराबे इधर उधर नहीं फेंकता है..

अब fridge भी घर की तरह खाली रहता है


बाथरूम भी सूखा रहता है

Kitchen हर दम सिमटा रहता है

अब हर घंटी पर लगता है कि शायद कोई surprise है

और बच्चों की कोई नयी फरमाईश है

अब तो रोज मेरी सेहत फोन पर पूँछते हैं 

मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं 

पहले हम उनके झगड़े निपटाते थे 

आज वे हमें समझाते हैं 

लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं


मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं।।

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