लखनऊः लखनऊ का हज़रतगंज और हज़रतगंज का मेफेयर, सोने में सुहागा की कहावत चरितार्थ करते थे। वास्तव में हज़रतगंज लखनऊ की शानदार पगड़ी थी और मेफेयर उसमें जतन से जड़ा गया हीरा। Meraj Uddin Siddiqui आज से दो सौ सात साल पहले जब नवाब सआदत अली ने एक यूरोपियन स्टाइल बाज़ार बनाने की शुरुवात की थी तो उन्हें इल्म भी नहीं होगा कि लगभग सौ साल बाद एक ऐसी ईमारत बनेगी जो की उर्दू अदब और अंग्रेजी रॉयल्टी की गंगा-जमुनी तहजीब बन कर लखनऊ की शान बढ़ाएगी। मेफेयर सिनेमा 1996 में अचानक बंद ज़रूर हो गया पर इस बिल्डिंग का स्टेटस अब तक आइकोनिक ही रहा है। मेफेयर को लखनऊ का लैंडमार्क बनाने में न तो किसी नवाब का हाथ था न ही किसी अंग्रेज का बल्कि एक रिफ्यूजी का जो की आज के पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाके से लखनऊ आया था। वो एक सिन्धी था और उसका नाम था सेठ ज्ञानचंद थडानी। उन्हीं दिनों दो और सिन्धी प्रवासी लखनऊ आये। सीवी अडवाणी और हीरानंद मनसुखानी। लगभग साथ-साथ आये इन तीन लोगों ने लखनऊ को वो कुछ दिया जिस पर आज भी शहरियों को नाज़ है। अडवाणी ने आजकल के गांधी आश्रम में किताबों की दूकान खोली जो बाद में मेफेयर बिल्डिंग में जा बसी,...
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